मूडीज की मिडिल ईस्ट संघर्ष चेतावनी: भारत की GDP में 4% तक की गिरावट का खतरा, क्या है असल प्रभाव?

“मध्य पूर्व में जारी संघर्ष यदि लंबा खिंचा तो भारत की अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा नुकसान हो सकता है। मूडीज एनालिटिक्स के अनुसार, बेसलाइन अनुमान से भारत का आउटपुट 4% तक घट सकता है, जबकि 2026 में ग्रोथ 7.5% रहने का अनुमान है। ऊर्जा आयात पर निर्भरता के कारण तेल कीमतों में उछाल से महंगाई, रुपया कमजोर होना और विकास दर पर दबाव बढ़ेगा।”

मूडीज की मिडिल ईस्ट संघर्ष चेतावनी: भारत की GDP में 4% तक की गिरावट का खतरा

मूडीज एनालिटिक्स ने मध्य पूर्व के बढ़ते संघर्ष को एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है। यदि यह संघर्ष लंबा चलता है तो भारत सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल होगा। रिपोर्ट के अनुसार, भारत का आर्थिक उत्पादन बेसलाइन ट्रैजेक्टरी से लगभग 4% तक नीचे आ सकता है। यह गिरावट मुख्य रूप से ऊर्जा आपूर्ति में बाधा, क्रूड ऑयल कीमतों में तेज उछाल और वैश्विक व्यापार मार्गों के प्रभावित होने से आएगी।

भारत अपनी कुल क्रूड ऑयल और प्राकृतिक गैस जरूरतों का करीब 40-46% मध्य पूर्व से आयात करता है। संघर्ष के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसी महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य में रुकावट आने पर तेल कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं। ऐसे में आयात बिल बढ़ेगा, जिससे चालू खाता घाटा (CAD) फैलेगा और रुपया पर दबाव बढ़ेगा।

मूडीज का बेसलाइन अनुमान भारत की GDP ग्रोथ के लिए इस प्रकार है:

2025 में 7.8%

2026 में 7.5%

2027 में 6.2-6.5%

2028 में लगभग 6%

यह अनुमान सामान्य परिस्थितियों में है, लेकिन लंबे संघर्ष की स्थिति में ग्रोथ 1-4% तक प्रभावित हो सकती है। क्षेत्रीय स्तर पर एशिया-प्रशांत की ग्रोथ 2025 में 4.3% से घटकर 2026 में 4% और 2027 में 3.6% रहने का अनुमान है। भारत अभी भी क्षेत्र में सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बनी रहेगी, लेकिन जोखिम बढ़ गए हैं।

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प्रमुख प्रभाव और जोखिम कारक

तेल कीमतों में उछाल : 10% तेल मूल्य वृद्धि से भारत की GDP ग्रोथ पर 0.25% का नकारात्मक असर पड़ सकता है। यदि ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर तक पहुंचता है तो प्रभाव और गहरा होगा।

महंगाई का दबाव : ऊर्जा लागत बढ़ने से खुदरा महंगाई 1.5-2% अतिरिक्त बढ़ सकती है। इससे RBI की मौद्रिक नीति जटिल हो जाएगी और ब्याज दरें स्थिर या ऊपर रह सकती हैं।

रुपये की कमजोरी : महंगे आयात से डॉलर के मुकाबले रुपया और गिर सकता है, जिससे विदेशी पूंजी प्रवाह प्रभावित होगा।

निर्यात और रेमिटेंस पर असर : खाड़ी देशों में भारतीय निर्यात और वहां काम करने वाले प्रवासियों की कमाई घट सकती है। UAE, सऊदी अरब जैसे बाजारों में व्यापार बाधित होने से निर्यात प्रभावित होगा।

वित्तीय क्षेत्र पर प्रभाव : बैंकिंग सेक्टर में क्रेडिट ग्रोथ 13.5-14% रहने का अनुमान है, लेकिन उच्च महंगाई और कमजोर मांग से NPA बढ़ सकते हैं।

भारत के लिए संभावित परिदृश्य

सामान्य स्थिति : ग्रोथ 7.5% (2026) बनी रहेगी, घरेलू मांग और निवेश से समर्थन मिलेगा।

मध्यम प्रभाव : संघर्ष 6-12 महीने तक चले तो ग्रोथ 1% घटकर 6.5% के आसपास आ सकती है।

गंभीर स्थिति : यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होता है या तेल आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है तो 4% तक का कुल आउटपुट नुकसान संभव है।

भारत सरकार और RBI पहले से ही वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, रूस से आयात बढ़ाने और रणनीतिक भंडार का उपयोग कर जोखिम कम करने की तैयारी में हैं। हालांकि, वैश्विक स्तर पर अमेरिकी टैरिफ अनिश्चितता और अन्य भू-राजनीतिक तनाव भी दबाव बढ़ा रहे हैं।

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