“कच्चे तेल की कीमतें Brent $80-82 प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं, जबकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अमेरिका-इजराइल हमलों के बाद ईरान की ओर से रुकावट ने वैश्विक आपूर्ति को खतरे में डाल दिया है। भारत, जो 88% कच्चे तेल का आयात करता है और आधे से ज्यादा मध्य पूर्व से आता है, अब आयात बिल में भारी बढ़ोतरी, मुद्रास्फीति दबाव और रुपये पर असर का सामना कर रहा है। फिलहाल पेट्रोल-डीजल कीमतें स्थिर हैं, लेकिन लंबे समय तक संकट बने रहने पर अर्थव्यवस्था की ग्रोथ प्रभावित हो सकती है।”
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और भारत की अर्थव्यवस्था पर गहराता संकट: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रुकावट क्यों है बड़ी टेंशन?
वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। Brent क्रूड ऑयल की कीमतें $80-82 प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई हैं, जबकि WTI भी $74 के करीब है। पिछले कुछ दिनों में कीमतों में 15-20% की बढ़ोतरी हुई है, जो मुख्य रूप से मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव से जुड़ी है। अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमलों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई की, जिसके चलते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। कई शिपिंग कंपनियां अब इस मार्ग से परहेज कर रही हैं और अफ्रीका के रास्ते घूमकर जा रही हैं।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल चोक पॉइंट है। यहां से रोजाना करीब 20 मिलियन बैरल तेल और बड़ी मात्रा में LNG गुजरता है, जो वैश्विक आपूर्ति का 20% है। ईरान ने इस जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी दी है और कुछ रिपोर्ट्स में जहाजों पर हमलों की खबरें भी आई हैं। इससे तेल टैंकरों की संख्या गल्फ में रुकी हुई है और सप्लाई चेन बाधित हो रही है।
भारत के लिए यह स्थिति बेहद गंभीर है क्योंकि देश अपनी कुल जरूरत का 88% कच्चा तेल आयात करता है। इसमें से करीब 55% मध्य पूर्व से आता है, जैसे इराक, सऊदी अरब, UAE और कुवैत से। इनमें से ज्यादातर शिपमेंट स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरते हैं। भारत रोजाना करीब 5 मिलियन बैरल तेल आयात करता है, जिसमें से 2.5 मिलियन बैरल इस मार्ग से आते हैं।
कीमतों में उछाल से भारत का आयात बिल बढ़ रहा है। उच्च कीमतें रुपये पर दबाव डालती हैं क्योंकि डॉलर में भुगतान होता है। इससे करेंट अकाउंट डेफिसिट चौड़ा हो सकता है। मुद्रास्फीति भी बढ़ने का खतरा है क्योंकि ईंधन कीमतें परिवहन, मैन्युफैक्चरिंग और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत बढ़ाती हैं। CPI और WPI दोनों पर असर पड़ता है। अनुमान है कि $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी GDP ग्रोथ को 0.25-0.30% तक कम कर सकती है।
फिलहाल पेट्रोल और डीजल की रिटेल कीमतें नहीं बढ़ाई गई हैं। ऑयल मार्केटिंग कंपनियां जैसे IOC, BPCL और HPCL ने पिछले वर्षों में कम कीमतों पर मार्जिन बनाए हैं, जिससे वे मौजूदा उछाल को कुछ समय तक सोख सकती हैं। सरकार भी कीमतों को स्थिर रखने की नीति पर कायम है। लेकिन अगर संकट लंबा खिंचा तो दबाव बढ़ेगा।
भारत के पास स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स हैं, जो करीब 40-45 दिनों की जरूरत पूरी कर सकते हैं। कमर्शियल स्टॉक और ट्रांजिट में तेल मिलाकर यह अवधि थोड़ी बढ़ सकती है। लेकिन लंबे डिसरप्शन में वैकल्पिक स्रोतों की तलाश जरूरी होगी। रूस से आयात बढ़ाने की संभावना है, जहां फरवरी में आयात कम हो गया था लेकिन अब उपलब्धता ज्यादा है। रूसी क्रूड एशियाई जल में फ्लोटिंग स्टोरेज में मौजूद है। अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका से भी विकल्प तलाशे जा सकते हैं, हालांकि लागत और लॉजिस्टिक्स ज्यादा होंगे।
प्रमुख प्रभावों की तालिका:
भारत की चुनौतियां और संभावित कदम
रिजर्व बढ़ाना और डाइवर्सिफिकेशन: रूस, अमेरिका और अफ्रीका से आयात बढ़ाना।
घरेलू उत्पादन: ONGC और अन्य कंपनियों से उत्पादन बढ़ाने के प्रयास।
ऊर्जा सुरक्षा: रिन्यूएबल एनर्जी और EV पर फोकस तेज करना।
डिप्लोमेसी: क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भारत की भूमिका महत्वपूर्ण।
| प्रभाव क्षेत्र | संभावित असर | अनुमानित प्रभाव |
|---|---|---|
| आयात बिल | $10 बढ़ोतरी पर सालाना अतिरिक्त $15-20 बिलियन | CAD बढ़ना |
| मुद्रास्फीति | ईंधन से जुड़ी लागत बढ़ने से CPI में 0.5-1% उछाल संभव | खाद्य और परिवहन महंगा |
| रुपये की कीमत | डॉलर मजबूत होने से ₹90+ का स्तर संभव | इंपोर्ट महंगा |
| GDP ग्रोथ | लंबे समय तक $90+ पर रहने से 0.25-0.50% ग्रोथ प्रभावित | निवेश और खपत कम |
| स्टॉक मार्केट | ऑयल मार्केटिंग कंपनियां प्रभावित, लेकिन रिफाइनरी मार्जिन बढ़ सकते हैं | सेक्टर रोटेशन |
यह संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी चुनौती है, लेकिन भारत जैसे तेज बढ़ते अर्थव्यवस्था वाले देश पर असर ज्यादा गहरा पड़ सकता है। स्थिति पर नजर रखना जरूरी है।
Disclaimer: यह लेख समाचार और विश्लेषण पर आधारित है। बाजार की स्थितियां तेजी से बदल सकती हैं। निवेश संबंधी कोई सलाह नहीं है।