“भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते में अमेरिकी शराब और स्पिरिट पर आयात शुल्क में कमी की घोषणा के बाद घरेलू शराब निर्माता संगठन CIABC ने समान अवसर की मांग की है। वे चरणबद्ध कटौती, राज्य स्तर पर समान उत्पाद शुल्क और बाजार पहुंच में संतुलन चाहते हैं, क्योंकि 2025-26 में अमेरिकी आयात बढ़ने से भारतीय ब्रांड्स को चुनौती मिल सकती है। समझौते से द्विपक्षीय व्यापार 500 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, लेकिन घरेलू उद्योग सुरक्षा मांग रहा है।”
भारत-अमेरिका व्यापार डील में शराब उद्योग की चुनौतियां
भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के तहत अमेरिकी शराब और स्पिरिट पर आयात शुल्क में उल्लेखनीय कमी की जा रही है, जिससे घरेलू शराब निर्माताओं में चिंता बढ़ गई है। कंफेडरेशन ऑफ इंडियन अल्कोहलिक बेवरेज कंपनियां (CIABC) ने सरकार से अपील की है कि आयात शुल्क कटौती को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए, ताकि भारतीय कंपनियां प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार हो सकें। संगठन के महानिदेशक विनोद गिरी ने कहा कि अगर अमेरिकी उत्पादों को बिना शर्त बाजार पहुंच दी गई, तो घरेलू ब्रांड्स जैसे United Spirits, Radico Khaitan और Tilaknagar Industries को बड़ा नुकसान हो सकता है।
समझौते के अनुसार, अमेरिकी स्पिरिट जैसे व्हिस्की, वाइन और अन्य अल्कोहलिक उत्पादों पर शुल्क 150% से घटाकर 50-75% तक किया जा रहा है। इससे अमेरिकी ब्रांड्स जैसे Jack Daniel’s, Jim Beam और Gallo Wines की भारत में पहुंच आसान हो जाएगी। CIABC का अनुमान है कि 2026-27 में अमेरिकी आयात 20% बढ़ सकता है, जो वर्तमान 10 अरब डॉलर के भारतीय अल्कोहल बाजार को प्रभावित करेगा। संगठन मांग कर रहा है कि राज्य सरकारें आयातित और घरेलू शराब पर समान उत्पाद शुल्क लगाएं, क्योंकि वर्तमान में कई राज्यों में आयातित उत्पादों को छूट मिलती है।
घरेलू उद्योग की प्रमुख मांगें
चरणबद्ध शुल्क कटौती : CIABC चाहता है कि शुल्क में कमी 3-5 वर्षों में धीरे-धीरे हो, ताकि भारतीय कंपनियां तकनीक और गुणवत्ता में सुधार कर सकें। वर्तमान में, समझौते में तत्काल 50% कटौती का प्रावधान है, जो घरेलू उत्पादकों को अचानक चुनौती दे सकता है।
समान बाजार पहुंच : अमेरिकी उत्पादों को भारतीय बाजार में आसान पहुंच मिल रही है, लेकिन भारतीय शराब जैसे Indian Made Foreign Liquor (IMFL) को अमेरिका में निर्यात के लिए समान छूट नहीं मिल रही। संगठन मांग कर रहा है कि समझौते में भारतीय निर्यात पर अमेरिकी शुल्क 18% से कम किया जाए।
राज्य स्तर पर नीति संतुलन : कई राज्य जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक और दिल्ली में आयातित शराब पर कम उत्पाद शुल्क लगता है। CIABC की मांग है कि केंद्र सरकार राज्यों को निर्देश दे कि घरेलू और आयातित उत्पादों पर एक समान कर लगाया जाए।
उद्योग सुरक्षा उपाय : संगठन ने सुझाव दिया कि अगर आयात 15% से अधिक बढ़े, तो अस्थायी सुरक्षात्मक शुल्क लगाया जाए, जैसा कि WTO नियमों में अनुमति है।
समझौते का व्यापक प्रभाव
भारत-अमेरिका समझौते से द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि की उम्मीद है। अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर शुल्क 50% से घटाकर 18% कर दिया है, जिससे भारतीय निर्यात जैसे टेक्सटाइल, चमड़ा और फुटवेयर को फायदा होगा। लेकिन शराब उद्योग के लिए यह दोधारी तलवार है। भारतीय अल्कोहल बाजार में घरेलू ब्रांड्स 85% हिस्सेदारी रखते हैं, लेकिन अमेरिकी आयात से प्रीमियम सेगमेंट में चुनौती बढ़ेगी। उदाहरण के लिए, 2025 में अमेरिकी वाइन आयात 12% बढ़ा था, और अब यह दोगुना हो सकता है।
CIABC के अनुसार, अगर मांगें नहीं मानी गईं, तो 50,000 से अधिक रोजगार प्रभावित हो सकते हैं, खासकर छोटे डिस्टिलरी यूनिट्स में। संगठन ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से मुलाकात की है और सुझाव दिया कि समझौते में ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ क्लॉज जोड़ा जाए।
शराब उद्योग के आंकड़े और तुलना
नीचे दी गई तालिका में भारत और अमेरिका के शराब बाजार की तुलना दिखाई गई है, जो समझौते के प्रभाव को समझाती है:
| पैरामीटर | भारत (2025 अनुमान) | अमेरिका (2025 अनुमान) | संभावित प्रभाव समझौते से |
|---|---|---|---|
| बाजार मूल्य (अरब डॉलर) | 10 | 250 | भारत में अमेरिकी आयात +20% |
| आयात हिस्सेदारी (%) | 15 | 5 | घरेलू ब्रांड्स को 10% नुकसान |
| प्रमुख उत्पाद | IMFL, देशी शराब | व्हिस्की, वाइन | प्रीमियम सेगमेंट में प्रतिस्पर्धा |
| रोजगार (लाखों में) | 2 | 1.5 | भारत में 0.5 लाख नौकरियां खतरे में |
| शुल्क दर (%) | 150 (पहले) | 18 (भारतीय निर्यात पर) | कटौती से आयात सस्ता |
यह तालिका दर्शाती है कि समझौते से अमेरिकी उत्पाद सस्ते होंगे, लेकिन घरेलू उद्योग को तैयारी का समय चाहिए।
उद्योग विशेषज्ञों के विचार
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि समझौता घरेलू कंपनियों को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाएगा, लेकिन तत्काल सुरक्षा जरूरी है। उदाहरण के लिए, Radico Khaitan के सीईओ अभिषेक खेतान ने कहा कि अगर समान अवसर मिले, तो भारतीय ब्रांड्स अमेरिकी बाजार में 10% हिस्सेदारी हासिल कर सकते हैं। वहीं, United Breweries ने चिंता जताई कि अमेरिकी स्पिरिट की कीमतें 30% कम होने से लोकल बियर मार्केट प्रभावित होगा।
CIABC ने सुझाव दिया कि सरकार ‘मेक इन इंडिया’ के तहत घरेलू डिस्टिलरी को सब्सिडी दे, ताकि वे अमेरिकी गुणवत्ता से मुकाबला कर सकें। संगठन का अनुमान है कि अगर मांगें मानी गईं, तो 2027 तक भारतीय शराब निर्यात 5 अरब डॉलर पहुंच सकता है।
राज्यों का रुख और नीतिगत सुझाव
विभिन्न राज्यों में शराब नीति अलग-अलग है। महाराष्ट्र में आयातित शराब पर 100% शुल्क है, जबकि दिल्ली में 75%। CIABC मांग कर रहा है कि केंद्र एक यूनिफॉर्म पॉलिसी लागू करे। संगठन ने WTO से भी अपील की है कि समझौते में घरेलू उद्योग की सुरक्षा शामिल हो।
समझौते से जुड़े अन्य क्षेत्रों में, अमेरिकी उत्पाद जैसे सोयाबीन तेल और मेवे पर भी शुल्क कम हो रहा है, लेकिन शराब उद्योग सबसे अधिक प्रभावित है। CIABC की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में घरेलू उत्पादन 8% बढ़ा था, लेकिन अब यह स्थिर रह सकता है अगर आयात बढ़ा।
भविष्य की संभावनाएं
अगर सरकार CIABC की मांगें मानती है, तो समझौता दोनों देशों के लिए फायदेमंद होगा। संगठन ने कहा कि समान अवसर से भारतीय कंपनियां अमेरिकी टेक्नोलॉजी अपनाकर वैश्विक ब्रांड बन सकती हैं। लेकिन अगर अनदेखी हुई, तो बाजार पर अमेरिकी कब्जा बढ़ सकता है, जो आत्मनिर्भर भारत की नीति के विपरीत होगा।
Disclaimer: यह समाचार रिपोर्ट उपलब्ध सूत्रों और उद्योग जानकारी पर आधारित है।